मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में आयोजित कैबिनेट बैठक में आज जन-कल्याण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, श्रमिक कल्याण, शिक्षा, न्यायिक आधारभूत संरचना, खेल, पर्यटन, पेयजल तथा औद्योगिक विकास से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं। इसकी जानकारी महानिदेशक सूचना एवं अपर सचिव मुख्यमंत्री बंशीधर तिवारी ने प्रेस ब्रीफिंग के दौरान मीडिया को दी।

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कैबिनेट ने हल्द्वानी के लामाचौड़ क्षेत्र में उपलब्ध 73 हेक्टेयर वन भूमि में से आवश्यकता अनुसार लगभग 30 हेक्टेयर भूमि उच्च न्यायालय परिसर के निर्माण हेतु हस्तांतरित करने के प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की।

कैबिनेट ने राज्य सेक्टर की गौ पालन योजना का दायरा बढ़ाते हुए सामान्य वर्ग के पशुपालकों को भी योजना से जोड़ने का निर्णय लिया। अब लाभार्थी गाय के साथ-साथ भैंस खरीदने का विकल्प भी चुन सकेंगे। पशु की यूनिट कॉस्ट 40 हजार रुपये से बढ़ाकर 60 हजार रुपये कर दी गई है। अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लाभार्थियों को 90 प्रतिशत तथा सामान्य वर्ग को 60 प्रतिशत तक सब्सिडी मिलेगी। इससे प्रथम वर्ष में लगभग 2128 पशुपालकों को लाभ मिलेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था, स्वरोजगार तथा पलायन रोकने में सहायता मिलेगी।

कैबिनेट ने मजदूरी संहिता, 2019 के तहत उत्तराखण्ड मजदूरी संहिता नियमावली, 2026 लागू करने का निर्णय लिया। इसमें न्यूनतम मजदूरी, ओवर टाइम का दोगुना भुगतान, प्रत्येक माह की सात तारीख तक वेतन, डिजिटल भुगतान तथा समान कार्य के लिए महिला एवं पुरुष को समान वेतन सुनिश्चित करने जैसे महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं।

समाज कल्याण विभाग के अधीन संचालित छात्रावासों के लिए संचालन नियमावली, 2026 लागू करने का निर्णय लिया गया। इससे अनुसूचित जाति एवं जनजाति के मेधावी छात्र-छात्राओं को बेहतर शैक्षणिक वातावरण, आवास, भोजन तथा सर्वांगीण विकास की सुविधाएं सुनिश्चित होंगी।

ईको टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति (एचपीसी) की संरचना में संशोधन किया गया। समिति में वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल करते हुए पर्यावरण संरक्षण, जड़ी-बूटी प्रबंधन, कूड़ा नियंत्रण तथा स्थानीय समुदायों के बेहतर समन्वय को मजबूत किया जाएगा।

केंद्र सरकार द्वारा किए गए संशोधनों के अनुरूप उत्तराखण्ड माल एवं सेवा कर अधिनियम, 2017 में संशोधन के लिए अध्यादेश लाने का निर्णय लिया गया, जिससे राज्य की कर व्यवस्था राष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप अद्यतन बनी रहेगी।

उत्तराखण्ड राज्य क्रीड़ा विश्वविद्यालय, गौलापार (हल्द्वानी) के सुचारू संचालन के लिए 122 नियमित पदों के साथ आउटसोर्स व्यवस्था के माध्यम से आवश्यक तकनीकी एवं सहायक पदों की स्वीकृति दी गई। इससे खिलाड़ियों को आधुनिक खेल सुविधाएं और गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण उपलब्ध होगा।

दिनेशपुर एवं शक्ति फार्म क्षेत्र के बंगाली मूल के अनुसूचित जाति समुदाय के हितों को ध्यान में रखते हुए सहायता कोष संचालन समिति में उपाध्यक्ष एवं सदस्य पदों पर उसी समुदाय से नामांकन का निर्णय लिया गया ।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में उत्तराखण्ड सहकारी समिति नियमावली, 2004 में संशोधन कर कुष्ठ रोग से संबंधित भेदभावपूर्ण प्रावधान हटाए जाएंगे तथा उनकी जगह मानसिक अक्षमता संबंधी न्यायालय द्वारा घोषित प्रावधान को शामिल किया जाएगा।

ग्रामीण पेयजल योजनाओं की कमीशनिंग तथा ग्राम पंचायतों एवं ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियों को हस्तांतरण हेतु भारत सरकार के निर्धारित प्रोटोकॉल को राज्य में लागू करने का निर्णय लिया गया।

उत्तराखण्ड वन विकास निगम सेवा (संशोधन) विनियमावली, 2026 लागू करते हुए स्केलर पदों के लिए 100 अंकों की लिखित परीक्षा का प्रावधान किया गया, जिससे भर्ती प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और आयोग की चयन प्रणाली के अनुरूप होगी।

उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखण्ड सरकार के बीच गंगा एक्सप्रेस-वे को मेरठ से हरिद्वार तक विस्तारित करने के लिए समझौता ज्ञापन किए जाने का निर्णय लिया गया। इससे धार्मिक पर्यटन, औद्योगिक निवेश, व्यापार और रोजगार को नई गति मिलेगी।

कैबिनेट ने औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के तहत उत्तराखण्ड औद्योगिक संबंध नियमावली, 2026 लागू करने का निर्णय लिया। इसमें औद्योगिक विवादों के समयबद्ध समाधान, ट्रेड यूनियनों की मान्यता, शिकायत निवारण समितियों का गठन, हड़ताल एवं तालाबंदी की स्पष्ट प्रक्रिया तथा श्रमिक री-स्किलिंग फंड जैसे महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किए गए हैं।

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आईडीबीआई बैंक के प्रस्तावित हिस्सेदारी बिक्री के विरोध में बैंक कर्मी 36 घंटे की भूख हड़ताल परप्रेस विज्ञप्तिIDBI BANK के प्रस्तावित निजीकरण के विरोध में हल्द्वानी में जोरदार प्रदर्शन2 एवं 3 नवंबर को देशव्यापी दो दिवसीय भूख हड़ताल – सार्वजनिक बैंकिंग, कर्मचारियों के अधिकार एवं संसदीय आश्वासनों की रक्षा का संकल्पस्थान: बुद्धा पार्क, हल्द्वानीदिनांक: 2 नवंबर 2026आज बुद्धा पार्क, हल्द्वानी में United Forum of IDBI Officers & Employees के आह्वान पर IDBI Bank के प्रस्तावित निजीकरण के विरोध में अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने जोरदार प्रदर्शन किया। इस अवसर पर केंद्र सरकार एवं LIC से IDBI Bank की प्रस्तावित बिक्री तत्काल रोकने तथा बैंक के सार्वजनिक क्षेत्र के चरित्र को बनाए रखने की मांग की गई।आंदोलन को मिला व्यापक समर्थनइस आंदोलन को उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता श्री दीपक बलूटिया ने अपना पूर्ण समर्थन प्रदान किया और कर्मचारियों की जायज मांगों का पुरजोर समर्थन किया।इसके साथ ही अन्य प्रमुख बैंक यूनियनों के प्रतिनिधियों—श्री गौरव जोशी (अध्यक्ष, AIBOC), श्री रोहित वर्मा (अध्यक्ष, UFBU) तथा श्री ओम प्रकाश (UFBU) ने भी धरना स्थल पर उपस्थित होकर अपना सक्रिय समर्थन व्यक्त किया।इसी क्रम में AIIDBIOA के महासचिव श्री पीयूष कुमार मौर्य तथा कारिणी सदस्य (GC Member) श्री गगन यादव ने अपने प्रभावशाली संबोधन से प्रदर्शनकारी कर्मचारियों का उत्साहवर्धन और प्रोत्साहन किया।प्रदर्शनकारियों ने कहा कि IDBI Bank केवल एक व्यावसायिक बैंक नहीं, बल्कि देश के औद्योगिक एवं आर्थिक विकास की ऐतिहासिक संस्था है। छह दशकों से अधिक समय में इस बैंक ने देश के औद्योगिक विकास, वित्तीय समावेशन और आर्थिक आत्मनिर्भरता में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।संसद के आश्वासन की अनदेखी क्यों?वर्ष 2003 में तत्कालीन वित्त मंत्री श्री जसवंत सिंह द्वारा संसद के दोनों सदनों में IDBI में कम-से-कम 51% सरकारी हिस्सेदारी बनाए रखने का आश्वासन दिया गया था। संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की 46वीं रिपोर्ट में भी सरकारी हिस्सेदारी 51% से कम नहीं रखने की सिफारिश की गई थी।आज कर्मचारियों का सवाल है कि संसद में दिए गए इस आश्वासन का क्या हुआ? क्या किसी महत्वपूर्ण सार्वजनिक वित्तीय संस्थान के भविष्य से जुड़ी इतनी बड़ी प्रतिबद्धता को बिना पर्याप्त संसदीय जवाबदेही के बदला जा सकता है?जब सार्वजनिक संसाधनों से बैंक को पुनर्जीवित किया गया, तो अब निजीकरण क्यों?IDBI Bank ने वित्तीय संकट और RBI के Prompt Corrective Action (PCA) के कठिन दौर का सामना किया। सरकार, LIC और कर्मचारियों के योगदान से बैंक ने अपनी वित्तीय स्थिति में सुधार किया और लाभप्रदता हासिल की।ऐसे में सवाल उठता है कि जब सार्वजनिक संस्थाओं और कर्मचारियों के त्याग से बैंक पुनः मजबूत हुआ है, तो अब इसका नियंत्रण निजी निवेशकों को सौंपने की आवश्यकता क्या है?निजीकरण केवल कर्मचारियों का नहीं, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय आर्थिक संप्रभुता का भी प्रश्न हैनिजीकरण के बाद भविष्य में कर्मचारियों की सेवा शर्तों, पेंशन, कल्याणकारी सुविधाओं और सरकारी आरक्षण नीतियों के भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएं हैं। इसके अतिरिक्त बैंक की विशाल परिसंपत्तियों, ग्राहकों की जमा पूंजी और देश की बैंकिंग व्यवस्था पर निजी एवं विदेशी नियंत्रण के संभावित प्रभावों पर भी पारदर्शी जवाब आवश्यक है।संविधान के अनुच्छेद 14, 38 और 39 की भावना के अनुरूप सरकारी निर्णयों में निष्पक्षता, सामाजिक-आर्थिक न्याय और सार्वजनिक हित सुनिश्चित किया जाना चाहिए।यूनियन की पांच प्रमुख मांगें