लालकुआं खबर -सेचुरी पेपर मिल की महिला मंडल ने घायल केदार की मदद को बढ़ाए हाथ”किया आर्थिक सहयोग”जल्द स्वस्थ होने की कामना”(पढ़े पुरी खबर)

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लालकुआं सेन्चुरी पल्प एण्ड पेपर महिला मंडल की तरफ से केदार पाठक को आर्थिक सहयोग राशि 84850 रुपये प्रदान की गई जिसमें महिला मंडल की सचिव नम्रता पाण्डे ने केदार पाठक के जल्द स्वस्थ होने की कामना करते हुए यहा आर्थिक राशि प्रदान की।
बताते चले कि बिगत 7 जून को संजय नगर द्वितीय बिन्दूखत्ता निवासी केदार पाठक ड्यूटी कर लगभग रात्रि 10 :15 बजे अपने घर को वापस लौट रहे थे कि अचानक रास्ते मे एक जंगली हाथी ने उन पर हमला कर दिया जिससे वे गम्भीर रूप से घायल हो गए और उन्हे आनन फानन में उन्हें साई हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया वही केदार पाठक की तैनाती सेंचुरी स्टाफ कालोनी स्थित कम्यूनिटी सेंटर की देखभाल तथा आयोजित होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों की सुनियोजित तरीके से करने की थी इस दौरान उनका आचरण एवम् कार्य कुशलता सदैव सराहनीय रही उनके उक्त योगदान, व्यवहार एवं के साथ घटित दुर्घटना को संवेदनशिलता को समझते हुए सेन्चुरी स्टाफ क्लब की सचिव नम्रता पाण्डेय द्वारा तत्काल मानवीय संवेदनाओं के अनुरूप मार्मिक रुख अपनाते घटना के अगले दिन ही चिकित्सालय जाकर केदार पाठक की कुशलक्षेम पूछने के पश्चात उनके परिवारजनो को तत्काल आर्थिक सहायता राशि 15000 नकद सहयोग दिया गया तथा आगे भी सहयोग प्रदान करने का आश्वासन दिया। जिसके बाद श्रीमती पाण्डे पाण्डेय द्वारा की गई पहल को आगे बढ़ाते हुए सेन्चुरी महिला मंडल की तमाम महिला सदस्यो द्वारा सामूहिक रुप से कुल राशि 84850/ की नकद आर्थिक सहायता प्रदान की गई। इस कार्य में महिला मंडल की पदाधिकारी सचिव नम्रता पाण्डेय, सहसचिव प्रतिमा जैन एंव कोषाध्यक्ष निशा कुमार सहित समस्त सदस्यों को सहयोग एवम् प्रयास सराहनीय रहा।

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आईडीबीआई बैंक के प्रस्तावित हिस्सेदारी बिक्री के विरोध में बैंक कर्मी 36 घंटे की भूख हड़ताल परप्रेस विज्ञप्तिIDBI BANK के प्रस्तावित निजीकरण के विरोध में हल्द्वानी में जोरदार प्रदर्शन2 एवं 3 नवंबर को देशव्यापी दो दिवसीय भूख हड़ताल – सार्वजनिक बैंकिंग, कर्मचारियों के अधिकार एवं संसदीय आश्वासनों की रक्षा का संकल्पस्थान: बुद्धा पार्क, हल्द्वानीदिनांक: 2 नवंबर 2026आज बुद्धा पार्क, हल्द्वानी में United Forum of IDBI Officers & Employees के आह्वान पर IDBI Bank के प्रस्तावित निजीकरण के विरोध में अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने जोरदार प्रदर्शन किया। इस अवसर पर केंद्र सरकार एवं LIC से IDBI Bank की प्रस्तावित बिक्री तत्काल रोकने तथा बैंक के सार्वजनिक क्षेत्र के चरित्र को बनाए रखने की मांग की गई।आंदोलन को मिला व्यापक समर्थनइस आंदोलन को उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता श्री दीपक बलूटिया ने अपना पूर्ण समर्थन प्रदान किया और कर्मचारियों की जायज मांगों का पुरजोर समर्थन किया।इसके साथ ही अन्य प्रमुख बैंक यूनियनों के प्रतिनिधियों—श्री गौरव जोशी (अध्यक्ष, AIBOC), श्री रोहित वर्मा (अध्यक्ष, UFBU) तथा श्री ओम प्रकाश (UFBU) ने भी धरना स्थल पर उपस्थित होकर अपना सक्रिय समर्थन व्यक्त किया।इसी क्रम में AIIDBIOA के महासचिव श्री पीयूष कुमार मौर्य तथा कारिणी सदस्य (GC Member) श्री गगन यादव ने अपने प्रभावशाली संबोधन से प्रदर्शनकारी कर्मचारियों का उत्साहवर्धन और प्रोत्साहन किया।प्रदर्शनकारियों ने कहा कि IDBI Bank केवल एक व्यावसायिक बैंक नहीं, बल्कि देश के औद्योगिक एवं आर्थिक विकास की ऐतिहासिक संस्था है। छह दशकों से अधिक समय में इस बैंक ने देश के औद्योगिक विकास, वित्तीय समावेशन और आर्थिक आत्मनिर्भरता में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।संसद के आश्वासन की अनदेखी क्यों?वर्ष 2003 में तत्कालीन वित्त मंत्री श्री जसवंत सिंह द्वारा संसद के दोनों सदनों में IDBI में कम-से-कम 51% सरकारी हिस्सेदारी बनाए रखने का आश्वासन दिया गया था। संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की 46वीं रिपोर्ट में भी सरकारी हिस्सेदारी 51% से कम नहीं रखने की सिफारिश की गई थी।आज कर्मचारियों का सवाल है कि संसद में दिए गए इस आश्वासन का क्या हुआ? क्या किसी महत्वपूर्ण सार्वजनिक वित्तीय संस्थान के भविष्य से जुड़ी इतनी बड़ी प्रतिबद्धता को बिना पर्याप्त संसदीय जवाबदेही के बदला जा सकता है?जब सार्वजनिक संसाधनों से बैंक को पुनर्जीवित किया गया, तो अब निजीकरण क्यों?IDBI Bank ने वित्तीय संकट और RBI के Prompt Corrective Action (PCA) के कठिन दौर का सामना किया। सरकार, LIC और कर्मचारियों के योगदान से बैंक ने अपनी वित्तीय स्थिति में सुधार किया और लाभप्रदता हासिल की।ऐसे में सवाल उठता है कि जब सार्वजनिक संस्थाओं और कर्मचारियों के त्याग से बैंक पुनः मजबूत हुआ है, तो अब इसका नियंत्रण निजी निवेशकों को सौंपने की आवश्यकता क्या है?निजीकरण केवल कर्मचारियों का नहीं, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय आर्थिक संप्रभुता का भी प्रश्न हैनिजीकरण के बाद भविष्य में कर्मचारियों की सेवा शर्तों, पेंशन, कल्याणकारी सुविधाओं और सरकारी आरक्षण नीतियों के भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएं हैं। इसके अतिरिक्त बैंक की विशाल परिसंपत्तियों, ग्राहकों की जमा पूंजी और देश की बैंकिंग व्यवस्था पर निजी एवं विदेशी नियंत्रण के संभावित प्रभावों पर भी पारदर्शी जवाब आवश्यक है।संविधान के अनुच्छेद 14, 38 और 39 की भावना के अनुरूप सरकारी निर्णयों में निष्पक्षता, सामाजिक-आर्थिक न्याय और सार्वजनिक हित सुनिश्चित किया जाना चाहिए।यूनियन की पांच प्रमुख मांगें