हल्द्वानी ब्रेकिंग-रेलवे ठेकेदार द्वारा बिना अनुमति के गौला नदी से बोल्डर उठाए जाने का मामला आया सामने”विडियों वायरल”चोरी किए गए बोल्डर से बना डाली दीवार”वन विभाग कर रहा है जांच-(पढे पुरी खबर)

ख़बर शेयर करें

हल्द्वानी रेलवे स्टेशन को बचाने के लिए गौला में बनायी जा रही सुरक्षा दीवार निर्माण में रेलवे का ठेकेदार लगा रहा है सरकारी राजस्व पर पलीता”रेलवे ठेकेदार द्वारा बिना अनुमति के गौला नदी से बोल्डर उठाए जाने का मामला आया प्रकाश में”वन विभाग के अधिकारी कर रहे है मामले की जांच”दोषी पाए जाने पर होगी संबंधित ठेकेदार पर उचित कार्यवाही।

हल्द्वानी मुकेश कुमार – बीते दिनों आई भीषण बरसात के बाद गौला नदी ने हल्द्वानी रेलवे समीप जमकर तांडव मचाया जिसमें रेलवे ट्रैक के आसपास भी भारी नुकसान नुकसान हुआ है तथा रेलवे स्टेशन के पास की जमीन गौला नदी में समा गई इधर रेलवे प्रशासन ने हल्द्वानी स्टेशन को बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। गौला नदी के कटाव से बचाने के लिए 100 मीटर वायरक्रेट दीवार बनाने की योजना पर तेजी से कार्य चल रहा है जो निसंदेह सराहनीय है किंतु हैरतंगेज पहलू यह है कि उक्त कार्य को अमलीजामा पहनाने वाले रेलवे के ठेकेदार द्वारा जिम्मेदार अधिकारियों की नाक के नीचे राजस्व की चोरी कर वारेन्यारे किए जाने का मामला प्रकाश में आया है सूत्रों की मानें तो रेलवे ठेकेदार द्वारा उक्त दीवार निर्माण हेतु प्रयोग में लाए जाने वाला उपखनिज वन विभाग की नदी से चोरी किया जाने का मामला उजागर हुआ है जिसका वीडियो सोश्यल मीडिया पर भी वायरल हुआ है ।


गौरतलब है कि हल्द्वानी रेलवे स्टेशन के पास गौला नदी के कटाव से स्टेशन को हो रहे नुकसान को रोकने को लेकर रेलवे विभाग संजीदा है रेलवे ने संवेदनशील जगह पर 100 मीटर की वायरक्रेट लगाने का ठेका अपने ठेकेदार को दे दिया तथा वायरक्रेट में उपयोग में लाने हेतु बोल्डर विधिवत रॉयल्टी जमाकर ठेकेदार को गुणवत्तायुक्त कार्य किए जाने को निर्देशित किया था किंतु ज्यादा कमाने के चक्कर में ठेकेदार द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले बोल्डर क्रय करने के बजाय बिना अनुमति के गौला नदी से उठाए जाने का मामला प्रकाश में आया है। ठेकेदार द्वारा उक्त कार्य में लगाए गए श्रमिक बेखौफ नदी से पत्थर उठाते वायरल वीडियो में दिखाई दे रहे हैं । वीडियो वायरल होने के बाद वन विभाग भी नींद से जागा है वन विभाग के अधिकारी मामले की जांच कराकर चोरी किए गए उपखनिज पर संबंधित ठेकेदार पर कार्यवाही किए जाने की बात कह रहे हैं वन क्षेत्राधिकारी गौला चंदन सिंह अधिकारी से दूरभाष पर हुई बात पर उन्होंने कहा कि ठेकेदार द्वारा बिना अनुमति के नदी से पत्थर उठाने का मामला उनकी संज्ञान में आया है वह मामले की जांच कराकर जुर्माने की कार्यवाही करेंगे।

Ad Ad Ad Ad

आईडीबीआई बैंक के प्रस्तावित हिस्सेदारी बिक्री के विरोध में बैंक कर्मी 36 घंटे की भूख हड़ताल परप्रेस विज्ञप्तिIDBI BANK के प्रस्तावित निजीकरण के विरोध में हल्द्वानी में जोरदार प्रदर्शन2 एवं 3 नवंबर को देशव्यापी दो दिवसीय भूख हड़ताल – सार्वजनिक बैंकिंग, कर्मचारियों के अधिकार एवं संसदीय आश्वासनों की रक्षा का संकल्पस्थान: बुद्धा पार्क, हल्द्वानीदिनांक: 2 नवंबर 2026आज बुद्धा पार्क, हल्द्वानी में United Forum of IDBI Officers & Employees के आह्वान पर IDBI Bank के प्रस्तावित निजीकरण के विरोध में अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने जोरदार प्रदर्शन किया। इस अवसर पर केंद्र सरकार एवं LIC से IDBI Bank की प्रस्तावित बिक्री तत्काल रोकने तथा बैंक के सार्वजनिक क्षेत्र के चरित्र को बनाए रखने की मांग की गई।आंदोलन को मिला व्यापक समर्थनइस आंदोलन को उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता श्री दीपक बलूटिया ने अपना पूर्ण समर्थन प्रदान किया और कर्मचारियों की जायज मांगों का पुरजोर समर्थन किया।इसके साथ ही अन्य प्रमुख बैंक यूनियनों के प्रतिनिधियों—श्री गौरव जोशी (अध्यक्ष, AIBOC), श्री रोहित वर्मा (अध्यक्ष, UFBU) तथा श्री ओम प्रकाश (UFBU) ने भी धरना स्थल पर उपस्थित होकर अपना सक्रिय समर्थन व्यक्त किया।इसी क्रम में AIIDBIOA के महासचिव श्री पीयूष कुमार मौर्य तथा कारिणी सदस्य (GC Member) श्री गगन यादव ने अपने प्रभावशाली संबोधन से प्रदर्शनकारी कर्मचारियों का उत्साहवर्धन और प्रोत्साहन किया।प्रदर्शनकारियों ने कहा कि IDBI Bank केवल एक व्यावसायिक बैंक नहीं, बल्कि देश के औद्योगिक एवं आर्थिक विकास की ऐतिहासिक संस्था है। छह दशकों से अधिक समय में इस बैंक ने देश के औद्योगिक विकास, वित्तीय समावेशन और आर्थिक आत्मनिर्भरता में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।संसद के आश्वासन की अनदेखी क्यों?वर्ष 2003 में तत्कालीन वित्त मंत्री श्री जसवंत सिंह द्वारा संसद के दोनों सदनों में IDBI में कम-से-कम 51% सरकारी हिस्सेदारी बनाए रखने का आश्वासन दिया गया था। संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की 46वीं रिपोर्ट में भी सरकारी हिस्सेदारी 51% से कम नहीं रखने की सिफारिश की गई थी।आज कर्मचारियों का सवाल है कि संसद में दिए गए इस आश्वासन का क्या हुआ? क्या किसी महत्वपूर्ण सार्वजनिक वित्तीय संस्थान के भविष्य से जुड़ी इतनी बड़ी प्रतिबद्धता को बिना पर्याप्त संसदीय जवाबदेही के बदला जा सकता है?जब सार्वजनिक संसाधनों से बैंक को पुनर्जीवित किया गया, तो अब निजीकरण क्यों?IDBI Bank ने वित्तीय संकट और RBI के Prompt Corrective Action (PCA) के कठिन दौर का सामना किया। सरकार, LIC और कर्मचारियों के योगदान से बैंक ने अपनी वित्तीय स्थिति में सुधार किया और लाभप्रदता हासिल की।ऐसे में सवाल उठता है कि जब सार्वजनिक संस्थाओं और कर्मचारियों के त्याग से बैंक पुनः मजबूत हुआ है, तो अब इसका नियंत्रण निजी निवेशकों को सौंपने की आवश्यकता क्या है?निजीकरण केवल कर्मचारियों का नहीं, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय आर्थिक संप्रभुता का भी प्रश्न हैनिजीकरण के बाद भविष्य में कर्मचारियों की सेवा शर्तों, पेंशन, कल्याणकारी सुविधाओं और सरकारी आरक्षण नीतियों के भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएं हैं। इसके अतिरिक्त बैंक की विशाल परिसंपत्तियों, ग्राहकों की जमा पूंजी और देश की बैंकिंग व्यवस्था पर निजी एवं विदेशी नियंत्रण के संभावित प्रभावों पर भी पारदर्शी जवाब आवश्यक है।संविधान के अनुच्छेद 14, 38 और 39 की भावना के अनुरूप सरकारी निर्णयों में निष्पक्षता, सामाजिक-आर्थिक न्याय और सार्वजनिक हित सुनिश्चित किया जाना चाहिए।यूनियन की पांच प्रमुख मांगें