लालकुआ अस्मिता मिश्रा ने निकाली नगर में रैली यशपाल आर्या ने कहा चौमुखी विकास एवं रुके हुऐ विकास कार्यों पर रहेगा फोकस

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लालकुआ नगर पंचायत चुनाव में अध्यक्ष पद के लिए कांग्रेस प्रत्याशी डॉ अस्मिता मिश्रा के प्रचार में दिग्गज वरिष्ठ नेताओं ने संबोधन कर विशाल जुलूस निकाला यहां पहुंचे नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्या ने कहा कि बीजेपी निकाय चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करते हुए धन बल का प्रयोग कर रही है, उन्होंने क्षेत्र के विकास के लिए कांग्रेस को वोट देने की अपील की।
यहां वार्ड नंबर एक में जनसभा को संबोधित करते हुए नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्या ने कहा कि पिछले 10 वर्षों से भारतीय जनता पार्टी उत्तराखंड में काबिज है, यहां जब से भाजपा की सरकार आई है तब से कोई भी विकास के कार्य नहीं हुए हैं, भाजपा समाज को बांटकर वोट हासिल कर रही है, बीजेपी सरकारी मशीनरी दुरुपयोग कर रही हैं। अतिक्रमण के नाम पर लोगों को उजाड़ा जा रहा है, कांग्रेसी नेताओं को डराने का कार्य किया जा रहा है, इसके बावजूद कांग्रेसी जमकर चुनाव मैदान डटे हुए हैं।
कांग्रेस प्रत्याशी डॉ अस्मिता मिश्रा ने कहा कि लालकुआं नगर के चौमुखी विकास एवं रुके हुए विकास कार्यों को पुनः शुरू करने के लिए उन्हें वोट दें। डॉ अस्मिता ने कहा कि लालकुआं क्षेत्र के लोगों को बहुत ही अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए वह तमाम कार्य करेंगी साथ ही निम्न तबके के लोगों की समस्याओं का तत्काल प्राथमिकता के आधार पर समाधान होगा।
इस दौरान पूर्व विधानसभा अध्यक्ष एवं स्थानीय निकाय के जिला प्रभारी गोविंद सिंह कुंजवाल, पूर्व कैबिनेट मंत्री हरीश चंद्र दुर्गापाल, कांग्रेस के जिलाध्यक्ष राहुल छिमवाल, कांग्रेसी नेता हरेंद्र बोरा, रवि शंकर तिवारी, पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष रामबाबू मिश्रा, वार्ड नंबर 1 की सभासद प्रत्याशी श्रीमती शिबू, मीना रावत, दीप्ति पांडे, हेमवती नंदन दुर्गापाल, महिला नेत्री बीना जोशी, उर्मिला मिश्रा, कांग्रेस नगर अध्यक्ष भुवन पांडे, गुरदयाल सिंह मेहरा, व्यापार मंडल के पूर्व अध्यक्ष अशोक अग्रवाल, पूरन सिंह रजवार, दीपक बत्रा, गंगा सिंह मेहरा, पूजा देवी और दिनेश लोहनी सहित भारी संख्या में क्षेत्रवासी मौजूद थे।।

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आईडीबीआई बैंक के प्रस्तावित हिस्सेदारी बिक्री के विरोध में बैंक कर्मी 36 घंटे की भूख हड़ताल परप्रेस विज्ञप्तिIDBI BANK के प्रस्तावित निजीकरण के विरोध में हल्द्वानी में जोरदार प्रदर्शन2 एवं 3 नवंबर को देशव्यापी दो दिवसीय भूख हड़ताल – सार्वजनिक बैंकिंग, कर्मचारियों के अधिकार एवं संसदीय आश्वासनों की रक्षा का संकल्पस्थान: बुद्धा पार्क, हल्द्वानीदिनांक: 2 नवंबर 2026आज बुद्धा पार्क, हल्द्वानी में United Forum of IDBI Officers & Employees के आह्वान पर IDBI Bank के प्रस्तावित निजीकरण के विरोध में अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने जोरदार प्रदर्शन किया। इस अवसर पर केंद्र सरकार एवं LIC से IDBI Bank की प्रस्तावित बिक्री तत्काल रोकने तथा बैंक के सार्वजनिक क्षेत्र के चरित्र को बनाए रखने की मांग की गई।आंदोलन को मिला व्यापक समर्थनइस आंदोलन को उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता श्री दीपक बलूटिया ने अपना पूर्ण समर्थन प्रदान किया और कर्मचारियों की जायज मांगों का पुरजोर समर्थन किया।इसके साथ ही अन्य प्रमुख बैंक यूनियनों के प्रतिनिधियों—श्री गौरव जोशी (अध्यक्ष, AIBOC), श्री रोहित वर्मा (अध्यक्ष, UFBU) तथा श्री ओम प्रकाश (UFBU) ने भी धरना स्थल पर उपस्थित होकर अपना सक्रिय समर्थन व्यक्त किया।इसी क्रम में AIIDBIOA के महासचिव श्री पीयूष कुमार मौर्य तथा कारिणी सदस्य (GC Member) श्री गगन यादव ने अपने प्रभावशाली संबोधन से प्रदर्शनकारी कर्मचारियों का उत्साहवर्धन और प्रोत्साहन किया।प्रदर्शनकारियों ने कहा कि IDBI Bank केवल एक व्यावसायिक बैंक नहीं, बल्कि देश के औद्योगिक एवं आर्थिक विकास की ऐतिहासिक संस्था है। छह दशकों से अधिक समय में इस बैंक ने देश के औद्योगिक विकास, वित्तीय समावेशन और आर्थिक आत्मनिर्भरता में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।संसद के आश्वासन की अनदेखी क्यों?वर्ष 2003 में तत्कालीन वित्त मंत्री श्री जसवंत सिंह द्वारा संसद के दोनों सदनों में IDBI में कम-से-कम 51% सरकारी हिस्सेदारी बनाए रखने का आश्वासन दिया गया था। संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की 46वीं रिपोर्ट में भी सरकारी हिस्सेदारी 51% से कम नहीं रखने की सिफारिश की गई थी।आज कर्मचारियों का सवाल है कि संसद में दिए गए इस आश्वासन का क्या हुआ? क्या किसी महत्वपूर्ण सार्वजनिक वित्तीय संस्थान के भविष्य से जुड़ी इतनी बड़ी प्रतिबद्धता को बिना पर्याप्त संसदीय जवाबदेही के बदला जा सकता है?जब सार्वजनिक संसाधनों से बैंक को पुनर्जीवित किया गया, तो अब निजीकरण क्यों?IDBI Bank ने वित्तीय संकट और RBI के Prompt Corrective Action (PCA) के कठिन दौर का सामना किया। सरकार, LIC और कर्मचारियों के योगदान से बैंक ने अपनी वित्तीय स्थिति में सुधार किया और लाभप्रदता हासिल की।ऐसे में सवाल उठता है कि जब सार्वजनिक संस्थाओं और कर्मचारियों के त्याग से बैंक पुनः मजबूत हुआ है, तो अब इसका नियंत्रण निजी निवेशकों को सौंपने की आवश्यकता क्या है?निजीकरण केवल कर्मचारियों का नहीं, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय आर्थिक संप्रभुता का भी प्रश्न हैनिजीकरण के बाद भविष्य में कर्मचारियों की सेवा शर्तों, पेंशन, कल्याणकारी सुविधाओं और सरकारी आरक्षण नीतियों के भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएं हैं। इसके अतिरिक्त बैंक की विशाल परिसंपत्तियों, ग्राहकों की जमा पूंजी और देश की बैंकिंग व्यवस्था पर निजी एवं विदेशी नियंत्रण के संभावित प्रभावों पर भी पारदर्शी जवाब आवश्यक है।संविधान के अनुच्छेद 14, 38 और 39 की भावना के अनुरूप सरकारी निर्णयों में निष्पक्षता, सामाजिक-आर्थिक न्याय और सार्वजनिक हित सुनिश्चित किया जाना चाहिए।यूनियन की पांच प्रमुख मांगें