लालकुआ निर्दलीय अध्यक्ष प्रत्याशी माजिद अली का खुला कार्यालय निस्वार्थ जरूरतमंद असहायों की मदद के लिये सदैव तत्पर जनता से मिला आशीर्वाद तो विकास को मिलेगी गति

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लालकुआ नगर पंचायत अध्यक्ष पद के निर्दलीय प्रत्याशी माजिद अली का पोस्ट ऑफिस व रेलवे स्टेशन के निकट कार्यालय का शुभारंभ हुआ कार्यालय का उद्घाटन मौलाना अब्दुल हफीज ने किया प्रत्याशी माजिद अली ने जनता से जीत का आशीर्वाद मांगा। उन्होंने कहा कि वह जनता के प्रत्याशी हैं। जिस तरह से महिलाएं, युवा और समाज का हर वर्ग उनसे जुड़ा रहा है और जिस तरह कोरोना काल में असहाय गरीबों को निःशुल्क भोजन कराकर रिकार्ड कायम किया और जरूरतमंदों एवं असहायों को रोजाना भोजन कराने वाली संस्था को क्षेत्रवासियों ने संस्था को निस्वार्थ भाव से कार्य को सराहा है उसी तरह हर वर्ग के लिये निस्वार्थ कार्य करते रहेंगे । माजिद अली ने कहा कि यदि लालकुआं नगर की जनता ने उन्हें अपना आशीर्वाद दिया तो वह अध्यक्ष बनते ही नगर पंचायत लालकुआं की ओर से गरीबों को निशुल्क रोजाना भोजन कराने का कार्य सबसे पहले करेंगे। उन्होंने कहा लालकुआं को आत्मनिर्भर शहर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य करेंगे। इस दौरान उन्होंने कहा लालकुआ के विकास की स्थिति को लंबे समय से देख रहे हैं। लालकुआ नगर में कई ज्वलंत समस्याएं अभी भी जस की तस है। संगठन के माध्यम से नगर की समस्याओं को लगातार उठाते आए, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इस बात से आहत होकर उन्होंने स्वयं ही अध्यक्ष पद के लिए निर्दलीय उम्मीद्वार के तौरपर नामांकन कर कार्यालय का शुभारंभ किया है और उन्हें उम्मीद है कि जनता उनका समर्थन करेगी। इस अवसर पर उनके साथ मानव सेवा समिति के अध्यक्ष फिरोज खान, महेंद्र कुमार, सईद सिद्दीकी, सज्जू खान, अफसर हुसैन, रईस सिद्दीकी, आदिल खान, राकेश कुमार, बबलू और महारत्न समेत तमाम गणमान्य एवं भारी संख्या में लोग शामिल रहे।

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आईडीबीआई बैंक के प्रस्तावित हिस्सेदारी बिक्री के विरोध में बैंक कर्मी 36 घंटे की भूख हड़ताल परप्रेस विज्ञप्तिIDBI BANK के प्रस्तावित निजीकरण के विरोध में हल्द्वानी में जोरदार प्रदर्शन2 एवं 3 नवंबर को देशव्यापी दो दिवसीय भूख हड़ताल – सार्वजनिक बैंकिंग, कर्मचारियों के अधिकार एवं संसदीय आश्वासनों की रक्षा का संकल्पस्थान: बुद्धा पार्क, हल्द्वानीदिनांक: 2 नवंबर 2026आज बुद्धा पार्क, हल्द्वानी में United Forum of IDBI Officers & Employees के आह्वान पर IDBI Bank के प्रस्तावित निजीकरण के विरोध में अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने जोरदार प्रदर्शन किया। इस अवसर पर केंद्र सरकार एवं LIC से IDBI Bank की प्रस्तावित बिक्री तत्काल रोकने तथा बैंक के सार्वजनिक क्षेत्र के चरित्र को बनाए रखने की मांग की गई।आंदोलन को मिला व्यापक समर्थनइस आंदोलन को उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता श्री दीपक बलूटिया ने अपना पूर्ण समर्थन प्रदान किया और कर्मचारियों की जायज मांगों का पुरजोर समर्थन किया।इसके साथ ही अन्य प्रमुख बैंक यूनियनों के प्रतिनिधियों—श्री गौरव जोशी (अध्यक्ष, AIBOC), श्री रोहित वर्मा (अध्यक्ष, UFBU) तथा श्री ओम प्रकाश (UFBU) ने भी धरना स्थल पर उपस्थित होकर अपना सक्रिय समर्थन व्यक्त किया।इसी क्रम में AIIDBIOA के महासचिव श्री पीयूष कुमार मौर्य तथा कारिणी सदस्य (GC Member) श्री गगन यादव ने अपने प्रभावशाली संबोधन से प्रदर्शनकारी कर्मचारियों का उत्साहवर्धन और प्रोत्साहन किया।प्रदर्शनकारियों ने कहा कि IDBI Bank केवल एक व्यावसायिक बैंक नहीं, बल्कि देश के औद्योगिक एवं आर्थिक विकास की ऐतिहासिक संस्था है। छह दशकों से अधिक समय में इस बैंक ने देश के औद्योगिक विकास, वित्तीय समावेशन और आर्थिक आत्मनिर्भरता में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।संसद के आश्वासन की अनदेखी क्यों?वर्ष 2003 में तत्कालीन वित्त मंत्री श्री जसवंत सिंह द्वारा संसद के दोनों सदनों में IDBI में कम-से-कम 51% सरकारी हिस्सेदारी बनाए रखने का आश्वासन दिया गया था। संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की 46वीं रिपोर्ट में भी सरकारी हिस्सेदारी 51% से कम नहीं रखने की सिफारिश की गई थी।आज कर्मचारियों का सवाल है कि संसद में दिए गए इस आश्वासन का क्या हुआ? क्या किसी महत्वपूर्ण सार्वजनिक वित्तीय संस्थान के भविष्य से जुड़ी इतनी बड़ी प्रतिबद्धता को बिना पर्याप्त संसदीय जवाबदेही के बदला जा सकता है?जब सार्वजनिक संसाधनों से बैंक को पुनर्जीवित किया गया, तो अब निजीकरण क्यों?IDBI Bank ने वित्तीय संकट और RBI के Prompt Corrective Action (PCA) के कठिन दौर का सामना किया। सरकार, LIC और कर्मचारियों के योगदान से बैंक ने अपनी वित्तीय स्थिति में सुधार किया और लाभप्रदता हासिल की।ऐसे में सवाल उठता है कि जब सार्वजनिक संस्थाओं और कर्मचारियों के त्याग से बैंक पुनः मजबूत हुआ है, तो अब इसका नियंत्रण निजी निवेशकों को सौंपने की आवश्यकता क्या है?निजीकरण केवल कर्मचारियों का नहीं, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय आर्थिक संप्रभुता का भी प्रश्न हैनिजीकरण के बाद भविष्य में कर्मचारियों की सेवा शर्तों, पेंशन, कल्याणकारी सुविधाओं और सरकारी आरक्षण नीतियों के भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएं हैं। इसके अतिरिक्त बैंक की विशाल परिसंपत्तियों, ग्राहकों की जमा पूंजी और देश की बैंकिंग व्यवस्था पर निजी एवं विदेशी नियंत्रण के संभावित प्रभावों पर भी पारदर्शी जवाब आवश्यक है।संविधान के अनुच्छेद 14, 38 और 39 की भावना के अनुरूप सरकारी निर्णयों में निष्पक्षता, सामाजिक-आर्थिक न्याय और सार्वजनिक हित सुनिश्चित किया जाना चाहिए।यूनियन की पांच प्रमुख मांगें