कौन बताएगा कब खनकेगी फावड़े और बेलचे की खनक: गौला संघर्ष समिति का विभिन्न मांगों को लेकर शहीद चौराहे से तहसील तक प्रदर्शन….

ख़बर शेयर करें

लालकुआं-: कुमायूं की लाइफ लाइन कही जाने वाली गौला नदी में अक्टूबर से खनखनाने वाले फावड़े और बेलचे की खनक अभी तक नहीं खनकने के चलते आज गौला संघर्ष समिति ने अपनी विभिन्न मांगों को लेकर बिंदुखत्ता क्षेत्र के शहीद चौराहे से तहसील तक गर्मजोशी के साथ प्रदर्शन कर जुलूस निकाला और राज्य सरकार से एक राज्य एक रॉयल्टी तथा तथा जीपीएस सिस्टम और वाहन फिटनेस समस्याओं के निराकरण की मांग को लेकर तहसील में ज्ञापन सौंपा इस दौरान हजारों लोगों ने प्रदर्शन करते हुए तुरंत गोला नदी के निकासी गेट खोलने की भी मांग की। तहसील में पहुंचकर विशाल प्रदर्शन करते हुए वक्ताओं ने राज्य में एक ही खनन रॉयल्टी निर्धारित करने की सरकार से मांग की वक्ताओं ने जीपीएस सिस्टम लगाने का भी विरोध करते हुए वाहनों के फिटनेस टैक्स को भी कम करने की मांग की।


गौरतलब है कि राजनैतिक गतिरोध के चलते अभी तक गौला नदी यह निकासी गेट नहीं खुल पाए हैं. जिसके चलते सात हजार से अधिक वाहन स्वामी और उससे जुड़े हुए लाखों लोगों के सामने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार का गहरा संकट उत्पन्न हो गया है इन सबके बीच वाहन स्वामी लगातार अपनी मांगों को लेकर संघर्षरत हैं कुमायूं में खनन ही एकमात्र रोजगार का साधन है जिससे सरकार को अरबों रुपए की राजस्व प्राप्ति होती है तथा हर युवा वर्ग इस से जुड़ कर अपने परिवार का भरण पोषण कर जीवन यापन कर रहा है लेकिन पिछले डेढ़ माह से खनन कारोबारी बेरोजगार होकर आंदोलन को लेकर मजबूर है फिर भी इनको सुनने वाला कोई नहीं है राजनेताओं से लेकर शासन-प्रशासन तक यहां तक अदालत में भी मामला जा पहुंचा लेकिन इस लाइफ लाइन को प्रारंभ कराने में कोई भी अभी तक आगे नहीं आ पाया है एक राज्य और एक रॉयल्टी को लेकर कैबिनेट में मामला पास भी हो गया है लेकिन इसमें भी अभी तक सकारात्मक पहल नहीं हो पाई है जिसके चलते श्रमिकों वाहन स्वामियों वाहन चालकों सहित क्षेत्र के लोगों की आर्थिक बुनियाद चरमराई हुई है जिसके चलते सभी लोग गौला नदी के निकासी गेट खोलने को लेकर संघर्षरत है।

Ad Ad Ad Ad

आईडीबीआई बैंक के प्रस्तावित हिस्सेदारी बिक्री के विरोध में बैंक कर्मी 36 घंटे की भूख हड़ताल परप्रेस विज्ञप्तिIDBI BANK के प्रस्तावित निजीकरण के विरोध में हल्द्वानी में जोरदार प्रदर्शन2 एवं 3 नवंबर को देशव्यापी दो दिवसीय भूख हड़ताल – सार्वजनिक बैंकिंग, कर्मचारियों के अधिकार एवं संसदीय आश्वासनों की रक्षा का संकल्पस्थान: बुद्धा पार्क, हल्द्वानीदिनांक: 2 नवंबर 2026आज बुद्धा पार्क, हल्द्वानी में United Forum of IDBI Officers & Employees के आह्वान पर IDBI Bank के प्रस्तावित निजीकरण के विरोध में अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने जोरदार प्रदर्शन किया। इस अवसर पर केंद्र सरकार एवं LIC से IDBI Bank की प्रस्तावित बिक्री तत्काल रोकने तथा बैंक के सार्वजनिक क्षेत्र के चरित्र को बनाए रखने की मांग की गई।आंदोलन को मिला व्यापक समर्थनइस आंदोलन को उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता श्री दीपक बलूटिया ने अपना पूर्ण समर्थन प्रदान किया और कर्मचारियों की जायज मांगों का पुरजोर समर्थन किया।इसके साथ ही अन्य प्रमुख बैंक यूनियनों के प्रतिनिधियों—श्री गौरव जोशी (अध्यक्ष, AIBOC), श्री रोहित वर्मा (अध्यक्ष, UFBU) तथा श्री ओम प्रकाश (UFBU) ने भी धरना स्थल पर उपस्थित होकर अपना सक्रिय समर्थन व्यक्त किया।इसी क्रम में AIIDBIOA के महासचिव श्री पीयूष कुमार मौर्य तथा कारिणी सदस्य (GC Member) श्री गगन यादव ने अपने प्रभावशाली संबोधन से प्रदर्शनकारी कर्मचारियों का उत्साहवर्धन और प्रोत्साहन किया।प्रदर्शनकारियों ने कहा कि IDBI Bank केवल एक व्यावसायिक बैंक नहीं, बल्कि देश के औद्योगिक एवं आर्थिक विकास की ऐतिहासिक संस्था है। छह दशकों से अधिक समय में इस बैंक ने देश के औद्योगिक विकास, वित्तीय समावेशन और आर्थिक आत्मनिर्भरता में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।संसद के आश्वासन की अनदेखी क्यों?वर्ष 2003 में तत्कालीन वित्त मंत्री श्री जसवंत सिंह द्वारा संसद के दोनों सदनों में IDBI में कम-से-कम 51% सरकारी हिस्सेदारी बनाए रखने का आश्वासन दिया गया था। संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की 46वीं रिपोर्ट में भी सरकारी हिस्सेदारी 51% से कम नहीं रखने की सिफारिश की गई थी।आज कर्मचारियों का सवाल है कि संसद में दिए गए इस आश्वासन का क्या हुआ? क्या किसी महत्वपूर्ण सार्वजनिक वित्तीय संस्थान के भविष्य से जुड़ी इतनी बड़ी प्रतिबद्धता को बिना पर्याप्त संसदीय जवाबदेही के बदला जा सकता है?जब सार्वजनिक संसाधनों से बैंक को पुनर्जीवित किया गया, तो अब निजीकरण क्यों?IDBI Bank ने वित्तीय संकट और RBI के Prompt Corrective Action (PCA) के कठिन दौर का सामना किया। सरकार, LIC और कर्मचारियों के योगदान से बैंक ने अपनी वित्तीय स्थिति में सुधार किया और लाभप्रदता हासिल की।ऐसे में सवाल उठता है कि जब सार्वजनिक संस्थाओं और कर्मचारियों के त्याग से बैंक पुनः मजबूत हुआ है, तो अब इसका नियंत्रण निजी निवेशकों को सौंपने की आवश्यकता क्या है?निजीकरण केवल कर्मचारियों का नहीं, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय आर्थिक संप्रभुता का भी प्रश्न हैनिजीकरण के बाद भविष्य में कर्मचारियों की सेवा शर्तों, पेंशन, कल्याणकारी सुविधाओं और सरकारी आरक्षण नीतियों के भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएं हैं। इसके अतिरिक्त बैंक की विशाल परिसंपत्तियों, ग्राहकों की जमा पूंजी और देश की बैंकिंग व्यवस्था पर निजी एवं विदेशी नियंत्रण के संभावित प्रभावों पर भी पारदर्शी जवाब आवश्यक है।संविधान के अनुच्छेद 14, 38 और 39 की भावना के अनुरूप सरकारी निर्णयों में निष्पक्षता, सामाजिक-आर्थिक न्याय और सार्वजनिक हित सुनिश्चित किया जाना चाहिए।यूनियन की पांच प्रमुख मांगें